प्रेम की पीर के कवि घनान्द

घनान्द का संक्षिप्त जीवन परिचय -
 इनका जन्म १६८९ ई० में हुआ था।ये जाति के कायस्थ थें। ये मुगल बादशाह बहादुरशाह 'रंगीले' के मीर मुंशी थें। ये कविता में निपुण तथा संगीत में भी सिद्धहस्त थें। मुगल दरबार में इनका सम्मान इनके विरोधियों की ईर्ष्या कारण बन गया और वे इनके विरुद्ध षड्यंत्र करने लगे। ये सुजान नाम की एक नर्तकी या वेश्या से प्रेम करते थें। ऐसा प्रचलित है कि एक बार षड्यंत्रकारी दरबारियों की गुजारिश पर बादशाह ने इनसे गाने को कहा।
इन्होंने टाल-मटोल कर इंकार कर दिया पर जब सुजान ने कहा तो गाने लगे पर बादशाह की ओर पीठ फेर कर  और सुजान की ओर उन्मुख होकर। बादशाह को यह उपेक्षापूर्ण व्यवहार असह्य प्रतीत हुआ। उसने इन्हें दिल्ली छोड़ने का हुक्म दिया। दिल्ली छोड़ते समय इन्होंने सुजान से भी साथ चलने के लिए कहा पर उसने इंकार कर दिया। सुजान के नकारात्मक उत्तर से इनका ह्रदय आहत हुआ। इस सन्दर्भ में हिंदी साहित्य के इतिहास में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है कि - " जब ये चलने लगे तब सुजान से भी साथ चलने को कहा पर वह न गयी। इस पर इन्हें विराग उत्पन्न हो गया और ये वृन्दावन जाकर निम्बार्क सम्प्रदाय के वैष्णव हो गये और वहीं पूर्ण विरक्ति से रहने लगे।"

निम्बार्क सम्प्रदाय में माधुर्य भक्ति को महत्व दिया गया है। ईश्वर और जीव के सम्बन्ध में माधुर्य का समावेश करना इस संप्रदाय की विशेषता रही है। घनानंद का  प्रेमी मन सहज ही इस संप्रदाय से प्रभावित हो गया । दीक्षा के बाद इनका साम्प्रदायिक नाम 'बहुगुनी' रखा गया।
इनकी मृत्यु के सम्बन्ध में आचार्य शुक्ल लिखते हैं कि - " सं. १७९६ में जब नादिरशाह की सेना के सिपाही मथुरा तक आ पहुँचे तब कुछ लोगों ने उनसे कह दिया की वृन्दावन में बादशाह का मेरे मुंशी रहता है; उसके पास बहुत कुछ माल होगा। सिपाहियों ने इन्हें आ घेरा और 'जर- जरोट ( अर्थात धन, धन, धन लाओ) चिल्लाने लगे। घनानंद जी शब्द को उलटकर ' रज, रज, रज' कह कर तीन मुठी वृन्दावन की धूल उन पर फेंक दी। उनके पास सिवा इसके और था ही क्या? सैनिकों ने क्रोध में आकर इनका हाथ काट डाला।"

प्रेम की पीर के कवि के रूप में घनानंद - वैसे तो घनानंद की कविताओं में प्रेम के दोनों ही पक्षों, संयोग और वियोग कि अनुभूति का सहज प्रकाशन मिलता है परन्तु फिर भी इनकी प्रसिद्धी 'प्रेम की पीर के कवि' के रूप में है। प्रेम की पीड़ा की तीव्र अनुभूति इनकी कविता में विचित्रता तथा इनकी अभिव्यक्ति में विलक्षणता उत्पन्न करती है। इनकी पीड़ा ऐसी है जो एक सीमा के बाद शब्दातीत हो जाती है इसलिए इनकी कविता में एक प्रकार का मौन है; बहुत  कुछ अनकहा रह जाता  है। परन्तु यह मौन, यह बहुत कुछ अनकहा ही हमें सब कुछ कह जाता है।
घनानंद स्वछंद धारा के कवि है । रीतिकाल कि अन्य कविताओं की रचना जैसा दरबारी अभिरुचि के अनुरूप अथवा शास्त्रीयता के प्रदर्शन के उद्देश्य से हुई है वैसी रचनाएँ इन्होनें नहीं की है। इन्होंने कविता नहीं की है बल्कि कविता तो इनसे सहज ही होती होती चली गयी है। भावानुभूति का आवेग इनके अंतर से कविता के रूप में प्रस्फुटित होता चला गया। इसीलिए इनकी कविता में सहजता है, सरलता है, किसी प्रकार का अनावश्यक प्रदर्शन नहीं है बल्कि भावों का सहज प्रवाह है। वास्तव में भाव ही काव्य की आत्मा है। भावविहीन कविता निरर्थक है तथा अलंकारादि बाह्य प्रदर्शनों के अत्यधिक प्रयोग से यह और भी दुरूह , बोझिल और प्रभावहीन हो जाती है। इन्होंने अपने काव्य में मुख्य रूप से काव्य के नैसर्गिक तत्वों को को ही स्थान दिया है तथा इनकी कविता भी इनकी आतंरिक अनुभूति का सहज प्रकाशन मात्र है। इसीलिए इनकी कविता के अध्ययन और समीक्षा के मानक भी परंपरागत मानकों से भिन्न है। इनकी कविता को समझने की योग्यता के सम्बन्ध  में इन्हीं के समकालीन कवि ब्रजनाथ जी लिखते हैं कि -
" नेही महा, ब्रजभाषा-प्रवीन, औ सुंदरताई के भेद को जानै।
जोग-वियोग की रीती में कोविद, भावना-भेद-स्वरुप को ठानै। 
चाह के रंग में भीज्यौ हियो, बिछुरें-मिले प्रीतम सन्ति न मानै। 
भाषा-प्रवीन, सुचंद सदा रहै, सो घन जी के कवित्त बखान ।।"

प्रेम  -   घनानंद को समझने के लिये, इनकी कविता का रसस्वादन करने के लिये सर्वप्रथम यह समझना आवश्यक है कि प्रेम या प्रीति क्या है?
कोई भी वस्तु या व्यक्ती यदि आपके लिये उपयोगी है, आपको सुख पहुँचता है तो उसके छिनने का भय या फिर अपने पास रखने का भाव लोभ कहलाएगा। लोभ जब उस वास्तु की पूरी जाति पर हो तब तक तो वह लोभ ही है परन्तु जब वही लोभ एक विशेष वस्तु या व्यक्ति पर स्थिर हो जाए तो वह प्रेम कहलाने लगता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ चिंतामणि के 'लोभ और प्रीति' नामक लेख में लिखा है - 
" जिस प्रकार का सुख या आनंद देनेवाली वस्तु के सम्बन्ध में मन की ऐसी भावना होते ही प्राप्ति, सानिध्य या रक्षा की प्रबल इच्छा जाग पड़े , लोभ कहलाता है  ……………जहाँ लोभ सामान्य या जाति के प्रति होता है वहाँ वह लोभ ही रहता है जहाँ पर किसी जाति के किसी एक ही व्यक्ति के प्रति होता है वहाँ 'रूचि' या 'प्रीति' का पद प्राप्त  करता है। लोभ सामन्योन्मुख होता है और प्रेम विशेषोन्मुख।" 

घनानंद और उनकी प्रेमानुभूति - 
घनानंद के जीवन में प्रेम का स्थान बड़ा ही ऊँचा है। इनका सारा जीवन और काव्य प्रेम रुपी रस से ओत-प्रोत है। इनका प्रेम सामान्य नहीं है, उदात्त है। परन्तु फिर भी वायवीय नहीं है, शरीरी है। इन्होंने सुजान के पेशे आदि को नज़रअंदाज उससे प्रेम किया और उससे नकारात्मक प्रतिक्रिया पाकर भी   उससे प्रेम करना नहीं छोड़ा   बल्कि अपने इस प्रेम तथा सुजान को अपनी रचनाओं से अमर बना दिया। प्रेम के मार्ग में इन्हे जो ठेस लगी उससे वे निराश नहीं हुए बल्कि और भी उत्साह से प्रेम के पथ पर आगे बढ़ते गए और अपने प्रेम को आध्यात्मिकता की पराकाष्ठा तक पंहुचा दिया। इन्होंने जिस तरह डूब कर सुजान से प्रेम किया उसी तरह डूब कर कृष्ण की भक्ति भी की। इन्होंने प्रेम और भक्ति के बीच की रेखाओं को मिटा दिया। इनका लौकिक प्रेम कब लोक की सीमाओं का अतिक्रमण कर लोकोत्तर  तक पहुँच जाता है यह पता ही नहीं चलता। 
घनानंद को प्रेम में पीड़ा मिलती है पर ये उस पीड़ा में ही आनंद का अनुभव करते हैं। प्रेम को ये साधना का दर्जा देते हैं तथा प्रेम के दोनों ही पक्षों का सम्पूर्णता से अनुभव करते हैं। ये  संयोग का अनुभव जिस तन्मयता के साथ करते है, वियोग का भी उसी तन्मयता के साथ करते है। इनके प्रेम में पलायन का भाव कहीं नहीं मिलता है और न ही निराशा दिखती है। प्रेम में विरह से पलायन के लिए मृत्यु का वरन करना तो इनकी दृष्टि में कायरता है। इसीलिए इन्होंने के दो परम्परागत और आदर्श प्रतिक माने जाने वाले में और पतंग दोनों की भर्त्सना की है -

" मरिबो बिसराम गनै वह तो बापुरो मीट तज्यौ तरसै। 
वह रूप छठा न सहारि सकै यह तेज तवै चितवै बरसे। 
घनआनंद कौन अनोखी दसा मतिआवरी बावरी ह्वै थरसै।
बिछुरे-मिले मीन-पतंग-दसा खा जो जिय की गति को परसै।।"  

सुख हो या दुख, दोनों की तीव्र और अत्यधिक घनीभूत अनुभूति वर्णनातीत हो जाती है। घनानंद की प्रेमानुभूति भी ऐसी ही है जिससे इनकी कविताओं में काफी कुछ मौन से ही सम्प्रेषित हो जाता है। घनानंद की बात (काव्य का कथ्य) रुपी दुल्हन ऊर रुपी भवन में मौन का घूँघट डालकर बैठी रहती है। कोई काव्य मर्मज्ञ 'सुजान' ही इसे प्राप्त कर सकता है। -

" उर भौन में मौन को घूँघट कै दुरि बैठी बिराजत बात बानी। 
मृदु मंजू पदार्थ-भूषन सों सुलसै हुलसै रस-रूप मनी।।"  

घनानंद स्वयं अपने प्रिय को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि मैं तुमसे कितना प्रेम करता हूँ यह शब्दों में कैसे व्यक्त करूँ? नहीं कर सकता तथा  करने की आवश्यकता भी नहीं क्योंकि तुम  'सुजान' हो। कुछ भी कह सकने में असमर्थ और चातक की भाँति बादल की ओर दृष्टि लगाये प्रिया का ध्यान सारे संसार से हटकर प्रिय की ओर ही लगा हुआ है। -
 " मन जैसे कछू तुम्हें चाहत है सु-बखनीयै कैसे सुजान ही हौ। 
इन प्राननि एक सदा गति रावरे, बावरे लौं लगियै नित लौ। 
बुधि और सुधि नैननि बैननि मैं करिबास निरंतर अंतर गौ।
उधरौ जग चाय रहे घनआनंद चातिक  त्यौं तकिये अब तो।।     

 घनान्द का प्रेम इसलिए भी अनोखा है  क्योंकि इसमें इनका अथवा इनकी इच्छा का  कोई महत्व नहीं है बल्कि इनका सारा  हृदय-व्यापार ही इनके प्रिय पर केंद्रित है
प्रेम को सामान्यतः आग का दरिया आदि कहा गया है। स्वयं घनानंद के समकालीन कवि बोधा प्रेम के विषय में कहते हैं कि - 
" यह प्रेम को पंथ कराल महा, तलवार की धार पे धावनों है ।"  

परन्तु इस मान्यता के विपरीत घनानंद ने कहा है -

" अति सूधो सनेह कर मारग है जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं। 
तहाँ साँचे  चलैं तजी आपुनपो झझकैं कपटी जे निसाँक नहीं। 
घनआनंद प्यारे सुजान सुनौ आईटी एक ते दुसरो आँक नहीं। 
तम कौन धौ  पाटी पढ़े हो लला मन लेहु पाई देहु छटाँक नहीं।।"  

घनान्द की प्रेमानुभूति अद्भुत है, अद्वितीय  है। ऐसा इसलिए है की ये उनकी स्वभुक्त अनुभूति है न की किताबी अथवा सुनी-सुनाई ।  इनका का पूरा जीवन ही प्रेम को समर्पित है। इस तरह से डूब कर प्रेम करने वाले शयद ही मिले। इनकी प्रेमानुभूति इतनी विलक्षण थी तथा कृष्ण और ब्रज-भूमि के कण-कण से से इन्हें इतना प्रेम था कि ये ब्रज की रज में लोटते हुए मारना चाहतें थें। कहा जाता है कि नादिरशाह के सैनिक जब इन्हें मारने लगे  तब इन्होंने उनसे मुस्कुराते हुए कहा था की वे उन्हें तड़पा-तड़पा कर धीरे-धीरे मारें ताकि वह ब्रज की रज में भली-भांति लोट कर ही मरें। प्रेम की ऐसी विलक्षण अनुभूति अन्यत्र दुर्लभ है। 



घनानंद की विरहानुभूति -  घनान्द विरह के कवि के रूप में प्रसिद्ध हैं।  आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भी इस सन्दर्भ में लिखा है कि,
"  यद्यपि इन्होंने संयोग और वियोग दोनों पक्षों को लिया है, पर वियोग की अंतर्दशाओं की ओर इनकी दृष्टि अधिक है। इसी से इनके वियोग सम्बन्धी पक्ष ही प्रसिद्ध है।"   
वास्तव में इन्होंने संयोग के सुख को पूरी सम्पूर्णता के साथ भोग है। संयोग की ये पूर्णता ही इनके वियोग वर्णन को प्रभावशाली बनती है। संयोग में इन्हें जो तीव्र घनीभूत अनुभूति हुई उसी कारण इनका वियोग भी मर्मांतक सिद्ध हुआ। बिना संयोग के वियोग कैसे संभव है? संयोग के बिना वियोग के स्वर या तो काल्पनिक होंगे जो प्रभावहीन हो जाएँगे या फिर रहस्यात्मक। परन्तु घानन्द के साथ ऐसा नहीं है। इनका वियोग इसलिए प्रभावी और प्रसिद्ध है क्योंकि इनकी विरहनुभूति वास्तविक और लौकिक है। इन्होंने सुजान से खुलकर प्रेम किया, पूर्ण रूप से स्वतंत्र एवं स्वछंद होकर इसलिए इनकी  विरहानुभूति भी बहुत ही मार्मिक  हुई। इस तरह के विहानुभूति की वलक्षणता के ये हिंदी के एक मात्र कवि है। अपनी विरह की रचनाओं से ये हिंदी साहित्य के किसी भी काल के अन्य किसी भी कवि से बीस ठहरते है। इस मामले में छायावादी कवि भी इनसे पिछड़ जाते हैं क्योंकि उनका संयोग अपने आप में अपूर्ण होता है। 
इनकी विरह-वेदना में ऐसी ताप है जिसके जिसके ज़िक्र भर से जीभ में छालें पर जाए और न कहें तो ह्रदय विरह वेदना को कैसे सहे? 
" कहिये किहि भाँति दसा सजनि अति ताती कथा रास्नानि दहै।
अरु जो हिय ही मढ़ी घुटी रहौं तो दुखी जिय क्यौं करी ताहि सहै ।।"  
घनान्द के जीवनवृत्त को देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि सुजान के व्यवहार से इनके ह्रदय को बड़ी ठेस पहुँची  और ये ठेस इतनी मर्मान्तक सिद्ध हुई की इसने इनके जीवन की दिशा ही बदल दी।वियोग के कारणों और रूपों की विवेचना करते हुए  डॉ० रामचन्द्र तिवारी ने अपने मध्ययुगीन काव्य साधना नमक ग्रन्थ में लिखा है कि , " इन सभी वियोगों में सबसे अधिक मर्मांतक विश्वासघात-जनित वियोग होता है। यह जीवन की धारा को बदल देता है। घनानंद का वियोग इसी कोटि का है। इसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। वे श्रृंगारी से भक्त हो गए।" 
घननंद  कभी भी सुजान की निष्ठुरता को भुला नहीं पाते हैं। इनका हृदय सुजान से फट जाता है, परन्तु ये उससे घृणा भी नहीं करते हैं । ये विरहनुभूति की ताप में तपते रहते हैं। सुजान से मिला अपकार और उसके बाद भी उसके प्रति इनका प्रेम तथा इनके व्यक्तिगत प्रेम का राधा-कृष्ण की प्रेम-मूर्ति में विलय, ये सब मिलकर इनके काव्य को विलक्षणता प्रदान करते हैं। 

" तुम ही गति हौ  तुम ही माटी हौ  तुमहि पति हौ  अति दीनन की। 
  नित  प्रीति   करौ  गुन-हीनन  सौ  यह  रीती  सुजान प्रवीनन की। 
  बरसौ  घनआनंद जीवन  को   सरसौ   सुधि  चातक  छीनन   की।
  मृदुतौ  चित के पण पै द्रित के निधि हौ  हित कै  रचि मीनन  की ।।" 
 प्रस्तुत  पद  में कृष्ण या सुजान को अलग करना  दुष्कर है । घनानंद के वियोग सम्बंधित पदों में इनके आत्माकी कतार ध्वनि सुनी जा सकती है। इनके पद ऐसे लगते हैं मानों सुजान के प्रति इनके सन्देश हो। ऐसा ही एक एक पद यहाँ द्रष्टव्य है जिसमें  निवेदन और उपालम्भ के स्वर कितने स्पष्ट हैं- 


" पाहिले अपनाय  सुजान सो, क्यौं  फिरि  तेह  कै  तोरियै  जू ।
   निरधार आधार  दै धार मझार   दई  गहि बाँह न  बोरियै जू  ।
   घनआनंद अपने चातिक  को गन बंधी लै  मोह न छोरियै  जू 
   रस प्याय कै  ज्वाय, बढ़ाय  कै आस, बिसास में  यौं बिस घोरियै जू।।" 
घनानंद  के अतीत की सुन्दर प्रेमानुभूति अब विरहनुभूति का शूल बनकर हृदय में धँस गई है। अतीत के संयोग की मधुर स्मृतियाँ विरहाग्नि में घृत का कार्य कर रहीं हैं। इसी सन्दर्भ का एक पद यहाँ द्रष्टव्य है जिसमें एक रमणी अपने प्रिय को उसके अनीतिपूर्ण आचरण के लिए उपालम्भ देते हुए कहती है-

"क्यों हँसि हेरी हर्यो हियरा अरू क्यों हित कै चित चाह बधाई।
कहे    को   बोली  सने  बैननि   चैननि    मैं    निसैन   चढ़ाई ।
सो सुधि मो हिय में घनआनंद  सालति  क्यों हूँ  काढ़ै न कढ़ाई। 
मीत सुजान अनीति  की  पाटी  इतै पै न  जानिए कौन पढ़ाई।।"  

 वियोग में हृदय जलता है और आँखें बरसती है। इन आँखों को बरसना भी चाहिए   क्योँकि इन्होंने ही तो प्रिय की सुन्दर छवि को हृदय तक पहुँचाया। हृदय  का इसमें  क्या दोष?  पहले जो आँखें प्रिय की सुन्दर छवि
देख-देख कर प्रसन्न होती थी, तृप्त होती थी, वाही आँखें अब दिन-रात अश्रु बहाती रहती है। आँखों की दीन दशा का घनानंद ने काफी अच्छा वर्णन किया है-

"जिनको नित नाइके निहारती ही तिनको  रोवती हैं। 
पल-पाँवड़े पायनी चायनी  सौं अँसुवानि की धरणी  हैं।
घनआनंद जान सजीवन को सपने बिन पाएई खोवति हैं।
न खुली-मुंदी जान परैं  कछु थे दुखदाई जगे पर सोवती हैं॥" 

इस  संसार में सच्चा प्रेम करने वाले स्नेही लोग ऐसे ही काम दिखते हैं। जैसे ही दो प्रेमियों के बीच के प्रेम की सुगंध  आभास लोगों को मिलता है  उनके विपरीत हो जाते हैं। माता-पिता, भाई-बंधु, नाते-रिश्तेदार कोई साथ नहीं देता। यह समाज तो सदा से प्रेम विरोधी रहा है पर श्याद विधाता को भी सच्चे प्रेमियों से चिढ़ है, तभी तो वह वियोग की सेना सजाकर प्रेमी युगलों पर टूट पड़ता है-

"इकतो जग मांझ सनेही कहाँ, पै कहूँ जो मिलाप की बास खिलै। 
तिहि देखि सके न बड़ो विधि कूर, वियोग समाजहि साजि मिलै।"  

इन्होंने सुजान से सच्चा प्रेम किया, अपना मन उसे समर्पित कर दिया। परन्तु सुजान ने उसे ठुकरा दिया। मन देने की पीड़ा वह क्या समझती क्योंकि वह तो सदा औरों का मन लिया करती थी-

 "लै  ही रहे  हो सदा मन  और  को दैबो न जानत राजदुलारे।......
   मो गति बूझि परै तब हो जब होहु धरिक हू आप ते न्यारे।।" 

घनानंद के प्रेम की विशेषता - घनानंद के वियोग-वर्णन की सबसे बड़ी विशेषता यह है की उसमें निराशा के लिए कोई स्थान नहीं है, हर हाल में आशा बानी हुई है। इन्हे अपने अंतर्मन की सच्ची पुकार पर भरोसा है की कभी तो यह प्रिय तक पहुंचेगी- 

"रुई दिए रहोगे कहाँ लौ बहराइबै की, कबहूँ तो मेरी ये पुकार कान खोलिहै।"
 अन्य  सन्दर्भों में यह पहले ही बताया जा चूका है कि  प्रेम में  प्राण त्याग कर उसे कलंकित करने को इन्होंने कायरता माना है। इस सन्दर्भ में यह उल्लेखनीय है की काव्य में वियोग की जिन दशाओं का वर्णन आचार्यों ने किया है, थोड़ा प्रयास करने पर लगभग उनमें से सभी इनकी कविता में मिल जाती है लेकिन मरण का वर्णन नहीं मिलता है। काव्यशास्त्र के विद्वान जिन विरह दशाओं का वर्णन करते हैं, वे हैं- अभिलाषा, चिंता, स्मृति, गुणकथन, उद्वेग, प्रलाप, उन्माद, व्याधि, जड़ता और मरण । इनमें  मरण का वर्णन आचार्यों ने निषिद्ध किया है। यहाँ यह स्पष्ट करना उचित होगा की इन्होंने विरह-वर्णन इन विरह दशाओं के अनुरूप अथवा शास्त्रनुमोदित अन्य परम्पराओं के अनुरूप नहीं किया है। इनका विरह वर्णन तो इनके स्वयं के घनीभूत विरहानुभूति का स्फोट है। इसमें हृदय पक्ष की प्रबलता है, भावों की तीव्रता है, गहराई है। इसमें इनके ह्रदय की शाश्वत तड़प है। इनकी कविता शास्त्रीय कलात्मकता से विहीन है परन्तु इसमें अभिव्यक्ति की नैसर्गिक कलात्मकता है। कुल मिला कर इन्होंने जिस प्रकार परम्पराओं और मान्यताओं के परे  जाकर सुजान से प्रेम किया उसी प्रकार शास्त्रीय परम्पराओं का खंडन कर विरह-वर्णन भी किया। एक सच्चे प्रेमी की वियोग में जो व्यथा होगी उसी की सीमा इनकी कविता है।  

#कबीरदास के कविता की विशेषता: यहाँ देखें।
#रीतिकाल की शुरुआत क्यों हुई: यहाँ देखें।

टिप्पणियाँ

  1. अत्यंत सुंदर संकलन। धन्यवाद। मैं अपना गृहकार्य पूर्ण कर पाया।

    उत्तर देंहटाएं
  2. धन्यवाद बन्धु! प्रोत्साहन से भरे ये शब्द बहुत मायने रखते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  3. मुझे घनानंद प्रिय है ।अभी अभी ही उनकी कविता पढ़ रही थी क्या उनका और सुजान का वास्तविक चित्र देखने को मिल सकता है? मैं घनानंद को देखना चाहती हूँ ।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. दुर्भाग्य से नहीं........ हिंदी कवियों के चित्र मिलना थोड़ा दुर्लभ हो जाता है। घनानंद तो फिर भी दूर हैं भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके सहयोगियों की पेंटिंग मिलती है। प्रसाद और निराला की तस्वीर खोजनी पड़ती है। घनानंद की जो तस्वीर उप्लब्ध थी वो ब्लॉग में लगाई हुई है। जहाँ तक सुजान की बात है ये उनकी असली तस्वीर नहीं है..... बस मुझे लगा कि वो कुछ ऐसी ही रही होगी..... घनानंद की कविता की तरह कुछ-कुछ छुपी हुई।

      हटाएं
    2. मै आपकी बात से सहमत हूं अभिषेक जी

      हटाएं
  4. उत्तर
    1. Kari kuri kokila kaleja Kim kor le ka arth kya hua? Ye kavi Ghananand ji Ki hi rachna hai.

      हटाएं
  5. घनानंद के बारे में पढ़ के बहुत दुख होता है लेकिन प्रेम का मार्मिक दृश्य दिखाए है उन्होंने

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

लोकप्रिय

बीती विभावरी जाग री..........

संत कबीर के दार्शनिक विचार