कबीर की कविता

1.
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी के 'कबीर' ग्रंथ के अध्ययन की शुरूआत मैंने कुछ सवालों के जवाब के खोज के क्रम में की। मेरे आसपास के कुछ जिह्वाबली जीव यदाकदा कबीर को लबार और मुँहजोर सिद्ध करने का प्रयत्न करते रहते थे। इतना ही नहीं वे उन्हें कवित्वशून्य, भावशून्य आदि भी सिद्ध करने पर तुले रहते थे। अब हमलोग उन जिह्वाबलियों का विरोध तो करते थे पर उनके आगे हमारी चलती न थी। वैसे ऐसा नहीं था कि मेरे उन जिह्वाबली मित्र का कबीर विषयक ज्ञान काफी बढ़ा-चढ़ा था बल्कि हमें उनकी औकात पता थी, ये वो महानुभाव हैं जो दिनकर की उर्वशी के समक्ष कालिदास आदि तक को भी कुछ नहीं समझते हैं। पर जब स्वयं का कबीर विषयक ज्ञान कम हो तब क्या किया जाय? अंत में मैंने अपनी औकात बढ़ाने की ठानी और अपने उन्हीं मित्र से द्विवेदी जी का 'कबीर' ग्रंथ उधार लिया तथा उसका अध्ययन प्रारम्भ किया। आप कृपया इस भ्रम में न पड़े कि मेरे वो बड़बोले जिह्वाबली मित्र उक्त ग्रंथ का अध्ययन कर चुके थे और उसके बाद भी अपनी विद्वता प्रदर्शित करने की हिमाकत कर रहे थे। ना, ऐसा नहीं था। वो ग्रंथ तो उनके पुस्तक-संग्रह का अनछुआ रत्न था। आज भी वो अनछुआ ही है तथा आगे भविष्य में भी कुछ काल तक उसके यथावत रहने कि संभावना है। खैर, उन्होंने सहर्ष अपना ग्रंथ-रत्न मुझे उधार देकर अपनी मानवता का परिचय दिया और दें भी क्यों न? इसमें उन्हें अपार संतोष मिलता है। सो इस संतोष-लाभ से वो चूके नहीं। मैंने भी हृदय से आशीर्वाद देते हुए उनसे ग्रंथ ग्रहण किया और सम्पूर्ण ग्रीष्मावकाश में उसका अध्ययन करता रहा।
                    अब जो मूल बात है वह यह है कि इस किताब ने कबीर विषयक मेरी मान्यताओं में, अवधारणाओं में बड़ा परिवर्तन किया। उन्हें समझने की, उन्हें देखने की एक नई दृष्टि दी। द्विवेदी जी बड़े ही विद्वतापूर्ण ढंग से  कबीर के प्रत्येक पहलू को बड़ी ही सूक्ष्मता से विवेचित किया है। और उस सूक्ष्म विवेचन के बाद तो शायद ही कुछ बच जाता है। लेकिन फिर भी मुझे मेरे प्रश्नों का उत्तर नहीं मिला। मुझे यह समझना था या कह सकते हैं कि जानना था कि कबीर कवित्व के स्तर पर, काव्य-वस्तु   के स्तर पर, काव्य-भाषा के स्तर पर कहाँ ठहरते हैं। चुकी प्रश्नचिन्ह भी उनके कवित्व पर ही लगाया जाता रहा था अतः उसका ही अध्ययन आवश्यक था। पर द्विवेदी जी ने अपने ग्रंथ का अधिकांश भाग कबीर की सामाजिक पृष्टभूमि के विवेचन में लगाया है, उसके बाद काव्य-वस्तु को स्थान दिया है। भाषा के बारे में यत्र-तत्र कुछ संकेत अवश्य हैं पर वो मुझ जैसे बेचारों के लिए पर्याप्त नहीं है। कहा गया है कि समझदार घोड़े के लिए चाबुक का इशारा ही काफी होता है। अफसोस! ना तो मैं समझदार ही हूँ, ना घोड़ा हूँ।
       कबीर को मैंने जो कुछ समझा है उसमें समय के साथ परिवर्तन होता रहेगा। पर अपने वर्तमान अनुभव को लिपिबद्ध करने का प्रयास करना अनावश्यक होकर भी कुछ कारणों से आवश्यक लग रहा है; पहला कारण यह कि मुझे इससे पीछे नहीं जाना पड़ेगा। यह लेख मेरे लिए मील के पत्थर का कार्य करेगा और मुझे पता रहेगा कि मुझे कहाँ तक पता है परिणामतः मैं उससे आगे बढ़ पाउँगा। दूसरा कारण, नहीं प्रयोजन अधिक उचित होगा, दूसरा प्रयोजन यह कि इस तरह अपने उन जिह्वाबली मित्र को उत्तर भी दे सकूँगा क्योंकि प्रत्यक्ष उनसे भिड़ने में समझदारी नहीं है। मेरे सुनने में आया है कि उन्हें भी बाली के समान वरदान मिला है और वे भी अपने प्रतिस्पर्धी का आधा जिह्वा-बल जबरन खींच लेते हैं। यहाँ मैं द्विवेदी जी से क्षमा याचना भी करना चाहूँगा क्योंकि मैंने ऊपर कहा कि उन्होंने केवल कुछ संकेतों से काम चला लिया है। तब मुझे चाहिए था कि मैं यहाँ अपने विषय का विस्तृत विवेचन करूँ। परंतु मैं अपनी अपरिपक्व बुद्धि और सीमित क्षमता से ऐसा नहीं कर पाउँगा। कुछ संकेत अवश्य करूँगा। पर ये संकेत पर्याप्त होंगे ऐसी मेरी धरणा है।

 2.
बाबा कबीर अपनी संधा-भाषा की उलटबाँसियों और समाज सुधार के दोहों के लिए प्रसिद्ध हैं। हाँ समाज सुधार के ही दोहे कहूँगा क्योंकि इसी रूप में वो आजकल प्रचलित हैं। पर कबीर के एक रूप का परिचय हिंदी वालों को तब से ही हो जाता है जब से वो मिला-मिला कर वाक्यों को पढ़ना शुरू कर देते हैं। ये रूप है नैतिक दोहों के रचयिता कबीर की। और इसी रूप में वो हमारे बाबा हैं। हिंदी पट्टी का कौन सा ऐसा जीव होगा जिसे 'गुरु गोविंद दोऊ खड़े........' या 'बड़ा हुआ तो क्या हुआ.......' या फिर 'साँच बराबर तप नहीं........' आदि नहीं याद हो? इन दोहों कि ही बात करें तो कुछ को देखकर आश्चर्य होता है:
'आछे दिन पाछे गए..... अब पछताए होत का चिड़िया चुग गई खेत।।'
समझना  मुश्किल हो जाता है कि ये दोहा प्रचलित मुहावरे का आधार लेकर बना है या फिर मुहावरा कबीर के इस दोहे के आधार पर। दोनों ही स्तिथियों में कबीर की प्रतिभा का लोहा मानना पड़ेगा। इसी कोटि का एक  एक और प्रचलित दोहा है:
'अति का भला न बोलना......अति की भली न धूप।।' हमारी भोजपुरी में इसे कहते हैं:
'ना अति बक्ता, ना अति चूपा। ना अति बरखा, ना अति सूखा।।'
                  कबीर एक ही बात को अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग ढंग से कहने में सिद्धहस्त हैं। परंतु कथन के इस दुहराव से भी वे उसकी धार कम नहीं होने देते हैं। उदाहरणार्थ देखिए-
'कारज धीरे होत हैं, कहें होत अधीर.....सींचो नीर।।'
और
'धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
 माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।।'
संभवतः ऐसी ही विशेषताओं को देखकर द्विवेदी जी ने कबीर को 'वाणी का डिक्टेटर' कहा होगा।
                     यहाँ थोड़ी बात उनकी भाषा पर कर लेना भी अप्रासंगिक नहीं होगा। उनकी भाषा के विषय में कुछ नया कहने की न तो मेरी इच्छा है न ही उतना सामर्थ्य है। मैं तो यहाँ आचार्य शुक्ल का ही उद्धरण दूँगा। शुक्ल जी ने जो एक बार उनकी भाषा को सधुक्कड़ी की संज्ञा दी तो फिर उसके आगे उन्हीं के द्वारा लिखी गई और बातें भुला दी गईं। आजकल तमाम लेखों, भाषणों और कक्षाओं में भी यह बता दिया जाता है कि कबीर की भाषा सधुक्कड़ी थी। सधुक्कड़ी का सीधा-सीधा अर्थ बताया जाता है, मिली-जुली भाषा। पर इस मिली-जुली भाषा के घटक क्या-क्या है? अपने इतिहास में शुक्ल जी ने स्पष्ट रूप से कबीर की भाषा के विषय में लिखा है; "इनकी भाषा सधुक्कड़ी अर्थता राजस्थानी, पंजाबी मिली खड़ीबोली है, पर 'रमैनी' और 'शबद' में गाने के पद हैं जिनमें काव्य की ब्रजभाषा और कहीं कहीं पूरबी बोली का भी व्यवहार है।" अर्थात उनके दोहों के वाक्यविन्यास का फ़्रेम खड़ीबोली का है और जहाँ-तहाँ राजस्थानी बोलियों के प्रयोग हैं, उदाहरणार्थ:
'साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।
 मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु ना भूखा जाय।।'
एक उदाहरण और देखिए,
'सुख में सुमिरन ना किया, दुःख में करता याद।
 कहे कबीर उस दास की, कौन सुने फरियाद।।'
इन सभी का बड़ी सरलता से वर्तमान खड़ीबोली में रूपांतरण किया जा सकता है।
                   काव्य-वस्तु में तीन महत्वपूर्ण तत्व होते हैं: 1. विचार, 2. कल्पना, और 3. भावना। कबीर की बनी कहीं नीरस यौगिक क्रियाओं के वर्णन और अतिशय दार्शनिकता के कारण शुष्क हो गई है तो कहीं भावना के मधुर रस में पगी हुई भी है। हम यहाँ कल्पना के विषय मे चर्चा करेंगे। विचार सबके पास होते हैं। भावनाएँ भी कमोबेश सबके पास होती हैं। एक कवि में होती है कल्पना, जो उपरोक्त दोनों तत्वों की संधि करा कर काव्य-व्यापार को सफल बनाती है। भाव लोक विलक्षण अनुभूतियों को 'बैखरी' में प्रकट करने के लिए भी कवि को कल्पना का सहारा लेना पड़ता है। इस तरह कल्पना न केवल अन्य दो तत्वों के मेल में सहयोगी होती है बल्कि  ये नवीन उद्भावना का भी कारण बनती है। अतः काव्य-व्यापार की सफलता के लिए अधिक मात्रा में कल्पना तत्व की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि श्रेष्ठ काव्य में विचार और भावना का संतुलन तथा नवीनता दोनों होनी चाहिए। इसीलिए श्रेष्ठ काव्य की रचना के लिए उच्च कोटि की कल्पना शक्ति की आवश्यकता पड़ती है। संसार के सभी महाकवि महान कल्पनाशीलता से युक्त होते हैं। उनकी कल्पना में दिव्यता, भव्यता और विराटता के दर्शन होते हैं। कबीर की कल्पना की विराटता देखिए:
'सब धरती कागद करूँ, लेखनी सब बनराई।
 सात समुन्द की मसि करूँ, गुरु गन लिखा न जाय।।'
इसी तरह उनके विलक्षण रूपक भी देखने योग्य है-
1. 'दस द्वारे का पिंजरा, तामें पंछी कौन।'
2. 'कबीर सोया क्या करे, उठी न भजे भगवान।
      जम जब घर ले जायेंगे, पड़ी रहेगी म्यान।।'
3.  'जल में कुंभ कुंभ में जल है, बाहर भीतर पानी।'
4.  'झल उठी झोली जली, खपरा फूटिम फूटि।
       जोगी था सो रमि गया, आसण रहि बिभूति।।' इत्यादि। इन रूपकों से कबीर की मौलिकता ओर उनकी कल्पनाशीलता का परिचय मिलता है। आखिर नए-नए रूपकों और नूतन उपमाओं की उद्भावना कौन कर सकता है, वही न जिसके पास उच्च कोटि की काव्य प्रतिभा होगी? जिस प्रकार संस्कृत में कालिदास की उपमाएँ अपनी विलक्षणता तथा अपने सटीक चयन  के लिए प्रसिद्ध हैं उसी प्रकार बाबा कबीर के रूपक भी अपनी विलक्षणता और मारक क्षमता के लिए प्रसिद्ध हैं। वही उदाहरण एक बार और द्रष्टव्य है: 'जम जब घर ले जायेंगे, पड़ी रहेगी म्यान।।' आत्माविहीन शरीर के लिए तलवारविहीन म्यान क्या सटीक रूपक है। तलवार के बिना म्यान का क्या मोल? ये रूपक केवल यहीं प्रयोग किया गया हो ऐसा भी नहीं है, '...मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान।।' म्यान की सज्जा के पीछे क्या पड़े हो भाई! तलवार का मोल करो।सबकी तलवार एक ही तत्व, लौह से बनी होने के बाद भी आकर-प्रकार, गुण-धर्म में अलग-अलग होती है। किसी की तलवार छोटी होती है, किसी की बड़ी होती है, किसी की तीखी होती है, किसी की चौड़ी होती है, किसी की तेज धार की होती है, किसी की भोथड़ी होती है, आदि-आदि। उसी के अनुसार उसका मूल्य भी होता है। इसलिए साधु की जात न पूछो, व्यर्थ बाह्य आवरण म्यान को न देखो। माना कि तुम्हारी जात ऊँची है, तुम्हारी म्यान सजीली है पर उससे क्या हुआ मूल्य तो आत्मा का होता है, मोल तो तलवार का लगाया जाता है और साधु की आत्मा तुमसे अधिक पवित्र है, उसकी तलवार तुमसे बड़ी और अधिक धारदार है। यह है कबीर बाबा की बनी। अर्थ के कई स्तर खुलते हैं इन नन्हें दोहों में।
                             कबीर चोटी के satirist हैं। satirist ही कहूँगा क्योंकि व्यंग्यकार कहने से वो अर्थ नहीं आ पाता है।  समाज की रूढ़ियों पर, उसकी विद्रूपताओं पर जिस पैनेपन के साथ, तीखेपन के साथ, प्रहारक क्षमता के साथ बाबा चोट करते हैं, दोहे जैसे छोटे छंद में वैसा करना उन्हीं के बस की बात है। इस रूप में वे अर्जुन के समान लगते हैं। नज़र ना इधर, ना उधर, सीधे चिड़िया की आँख पर और निशाना अचूक।
'पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ........पीस खाय संसार।।'
या
'काँकर पाथर जोरि के........क्या बहिरा हुआ खुदाय।।'
ये सुनकर मुल्ला जी की दाढ़ी में आग लग जाय और पंडित जी की चुटिया भी यह सोच कर खड़ी हो जाय कि ठाकुर और चक्की का एक ही मोल! वस्तुतः इसके पीछे कबीर का द्वेषभाव नहीं है बल्कि भक्तिभाव ही है। बिना हरि के प्रति प्रेम के मूर्ति पूजन किस काम का? और यदि सच्चा प्रेम है तो मूर्ति पूजन के बाहरी दिखावे की कोई आवश्यकता ही नहीं। व्यंग्यात्मकता पर ऐसा अधिकार बहुत ऊँची चीज है।
                                  एक बात अंत में यहाँ अप्रासंगिक होते हुए भी कहूँगा। कबीर पढ़े-लिखे न थे ये बात सब जानते हैं। प्राथमिक कक्षाओं से लेकर उच्च कक्षाओं तक यही पढ़ाया जाता है तथा चलते-फिरते लेखों से लेकर शोध प्रबंधों तक में यही लिखा जाता है। इस तथ्य के सत्यापन के लिए 'मसि कागद छुओ नहीं.....' को उद्धरित भी किया जाता है, पर रामस्वरूप चतुर्वेदी ने 'हिंदी काव्य का इतिहास' में एक नई बात लिखी है, जो मुझे अच्छी लगी। उनके अनुसार औपचारिक पढ़ाई तो निराला ने भी नही की थी। वे हिंदी पट्टी से दूर महिषादल में रहते थे, बैषवाड़ी बोलते थे और रामचरितमानस बाँचते थे। पत्नी के सुनाने पर 'सरस्वती' पत्रिका से उन्होंने खड़ीबोली हिंदी सीखी। परंतु फिर भी उन्होंने न केवल हिंदी कविता के ऊँचे से ऊँचे भाव को मूर्त रूप दिया है बल्कि विभिन्न काव्य धाराओं के प्रणेता भी रहे हैं। चतुर्वेदी जी संकेत करते हैं कि कबीर के साथ भी यही स्थिति थी। मैं इसमें एक बात और जोड़ना चाहूँगा। कहा जाता है कि उन्होंने (कबीर ने)  दोहों को मौखिक रूप से बोल दिया जिसे उनके भक्तों ने बाद में संग्रहित किया।  अब अगर वर्तमान में देखें तो डॉ0 नामवर सिंह के लेखन और भाषण में कितना अंतर है। जितना लिखा है उससे अधिक बोल गए हैं। जिसे बाद में संग्रहित और संपादित किया है हमारे हिंदी विभाग के प्रो0 आशीष त्रिपाठी जी ने। अब कबीर की पढ़ाई को लेकर फिर से काम होना चाहिए क्या पता हम जितना बड़ा अनपढ़ उन्हें समझ रहें हों वे उतने बड़े अनपढ़ न हो!
                                  अंत परंपरा में सुनते आ रहे बात को फिर से कहूँगा कि कबीर सब कुछ थे पर उससे पहले और कहीं बड़े भक्त थे। उन्होंने कहीं नहीं कहा है कि वे कवि हैं या कविताई करते हैं। इसलिए एक कवि के रूप में किसी अन्य से उनकी तुलना युक्तियुक्त न होगी। परंतु फिर भी कहना होगा कि वे कवित्व से हीन नहीं थे बल्कि द्विवेदी जी के शब्दों में उनमें कविताई की ऊँची से ऊँची चीज मिल जाती है।
                                                                     -अभिगुप्त
                                                                       पुनक, सिवान(बिहार)
                                                                       14/07/20017

◆ बीती विभावरी का अर्थ: यहाँ देखिये।

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